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राजस्थान में राजा के देवत्व की अवधारणा

राजस्थान के अभिलेखों, मुद्राओं और साहित्यिक ग्रन्थों से इस भू-भाग के प्राचीन राज्यों के प्रकाशन की जानकारी मिलती है। प्रशासनिक दृष्टि से राजा को राज्य का सर्वोच्च अधिकारी मानने की अवधारणा का विकास भारत में प्राचीन काल में ही हो चुका था। कौटिल्य के अर्थशास्र में राजा को संक्षिप्त राज्य कहकर पुकारा गया है।

राजा वैदिक काल से ही शक्ति सम्पन्न माना जाता रहा है यद्यपि उस समय उसके दैविक स्वरुप का विकास नहीं हो पाया था।

अथर्ववेद में अवश्य ही राजा पुरुकुत्स को “अर्द्धदेव” कहा गया है राजा के देवत्व की भावना का विकास ब्राह्मण काल में हुआ है। उन दिनों यह मान्यता थी कि अभिषेक के समय राजा के शरीर में अग्नि, सविता और बृहस्पति आदि देवता प्रवेश करते हैं। समाज में यह भावना बी बलवती थी कि अश्वमेघ यज्ञ करने वाले राजा को मृत्युपरान्त देव पद मिलता है। उस समय तो राजा को प्रजापति का प्रत्यक्ष रुप मानने लगे थे।

कुषाण काल में राजा स्वयं “देवपुत्र” होने का दावा करने लगे। उन्होंने मुद्राओं पर स्वयं को दैवीज्योति से आवृत बादलों से अवतरित होते हुए अंकित करवाया। कुषाणों ने अपने पूर्वजों की प्रतिमाएं दैवकुल में स्थापित कर उनकी पूजा-अर्चना की। स्मृतियों और पुराणों में राजा के देवत्व को स्वीकार किया गया है। मनु के अनुसार राजा के नर रुप में देवता है। ब्रह्मा ने आठों दिशाओं के दिक्पालों के शरीर का अंश लेकर उसके शरीर का निर्माण किया। विष्णु पुराण और भागवत पुराण के अनुसार राजा के शरीर में अनेक देवता निवास करते हैं। विष्णु पुराण में कहा गया है कि राजा वेन के शरीर पर विष्णु के नाना लाञ्छन विद्यमान थे।

राजा के देवत्व की परम्परा को बोद्धों ने भी स्वीकार किया औऱ उसे “सम्मुति देव’ कहकर पुकारा। संस्कृत नाटककारों नें भी राजा हेतु “देव’ शब्द का प्रयोग किया है। भारत में अवतारवाद की कल्पना के जन्म के बाद राजा को पृथ्वी पर ईश्वर का अवतार माना जाने लगा। “महाभारत’ स्मृतियों और पुराणों में राजा और देवताओं के कार्यों में समानता का चित्रण मिलता है। यद्यपि अनेक ग्रंथकारों ने राजा की तुलना देवताओं से की है, किन्तु उन्होंने यह कहीं भी नहीं लिका कि राजा स्वंय देवता है। मनु ने राजा के देवत्व को स्वीकार करते हुए भी मत प्रकट किया कि धर्म से विचलित होने पर राजा का नाश हो जाता है।

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राजा के देवत्व की परम्परा गुप्त काल में भी जारी रही। एकन्द गुप्त के भितरी-लेख में द्वितीय चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य को स्वयं या प्रतिरथ (साक्षात अप्रतिरथ अर्थात् विष्णु) कहा गया है। प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त की तुलना विष्णु से की गई है। राजा के देवत्व की कल्पना राजस्थान के साहित्यिक ग्रंथों और अभिलेकों में स्पष्टत: दृष्टिगोचर होती है। उद्योतन सूरि रचित “कवलयमाला कहा’ में राजा हेतु “महाराजाधिराज’ “परमेश्वर’ और “मकरध्वज’ जैसी उपाधियों का उपयोग किया गया है। जबकि “समराइच्च कहा’ में हरिभद्र सूरि ने राजा हेतु केवल “देव’ उपाधि का उपयोग ही उचित समझा।

प्रतिहार शासकों ने स्वयं को राजा, भूप, नृप और महाराज के रुप में लोकप्रिय बनाया। प्रतिहार द्वितीय नागभट भोज और महेन्द्रपाल ने “महाराजाधिराज” जैसे विरुद धारण किये। किन्तु उनके सामन्तों ने उन्हें “परम भट्टारक” और “परमेश्वर” आदि उपाधियों से भी सम्बोधित किया। नागभ के सामन्त बप्पक के पुत्र जज्जक की पुत्री जयावती के बुचकला अभिलेख में वलराज को “महाराजाधिराज’ और “परमेश्वर’ कहा गया है। उसके पुत्र नागभट को भी इसी उपाधि से विभूषित किया गया है। बाहड़देव के पाली से प्राप्त सोमनाथ मन्दिर लेख में कुमारपाल चौलुक्य को “परमभट्टारक महाराजाधिराज’ विरुद दिया गया है। चौलुक्य द्वितीय भीमदेव के सामन्त चाहमान, मदल ब्रह्मदेवे के कीराडू-लेख में भीमदेव के हेतु “महाराजाधिराज परमेश्वर और परम भट्टारक” सम्बोधन मिलता है। इसी नरेश के एक गुहिलवंशीय सामन्त अमृतपाल देव के वीरपुर-दानपत्र में भी उसके लिए परमेश्वर परम भट्टारक उपाधि निर्देशित है।

वाक्पति के काल से परमार शासक परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर उपाधि धारण करने लगे जबकि इसके पूर्व वे प्राय: “नृप” और “भूप” जैसी उपाधियां ही धारण करते थे। गुहिल और चाहमान शासक भी “परमेश्वर” और “राजेन्द्र” जैसे विरुदों से विख्यात थे। प्रतिहार प्रथम नागमर को अभिलेखों में साक्षात नारायण तथा भोज एवं विनायकपाल को आदि वराह और प्रथम महिपाल को कार्तिकेय कहा गया। प्रतिहार भोज का भी राजस्थान के विशाल भू-खण्ड पर अधिकार था। अभिलेखों में उसे “आदिवराह’ कहा गया है। मुद्राओं पर उत्कीर्ण उसकी “वराह’ शिरोधारी मनुष्याकृति कदाचित् इस बात की द्योतक है कि वह स्वयं को विष्णु का अवतार मानता था। विनायकपाल की श्रीमद् आदिवराह मुद्राओं का उल्लेख कामा के नवीं शती ईसवीं के लेख और ठक्कुर फैसकृत “दृव्य परीक्षा” ग्रन्थ में मिलता है।

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राजा के देवत्व की अवधारणा का सर्वाधिक प्रभाव चौहान राजाओं पर पड़ा। तृतीय पृथ्वीराज चाहमान को अभिलेखों में “परम भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर” और “पृथ्वीराज विजय” में “भारतेश्वर” कहा गया है। तृतीय “पृथ्वीराज” को उसकी समारिक उपलब्धियों के परिमाणस्वरुप राम और विष्णु के दस अवतारों के समान बतलाया गया है। शिवालिक अभिलेख में चतुर्थ विग्रहराज की तुलना विष्णु से की गई है। जबकि “पृथ्वीराज विजय” में उसे “मधुसंहारक” (विष्णु का एक नाम) कहा गया है।

राजस्थान के अभिलेखों में राजा का देवत्व अनेक प्रकार से प्रदर्शित किया गया है। विश्वकर्मा के गंगाधार-लेख (संवत् 480) में उसे बृहस्पति के समान बुद्धिमान, सम्पूर्ण कलाओं से युक्त चन्द्रमा के समान मुखवाला, राम और भागीरथ से तुलनीय और देवताओं के स्वामी (इन्द्र) को अपने पराक्रम से जीतने वाला कहा गया है।

झालारा पाटन शिव मंदिर लेख (संवत् 746) में कहा गया है कि अन्धकासुर के नाशक शिव की शंका इस राज में होती थी।

चाटसू अभिलेख (वि.सं. 870) के अनुसार कटंकी से रहित राम के समान अत्यन्त शूर-चतुर भूर्तृप गुहिल वंश में हुआ।

डबोक शिलालेख (वि.सं. 900-1000) में कक्क के किसी पुत्र (नाम अज्ञात) के लिए कहा गया है, वह श्रीमन कक्क का पुत्र था जो पृथ्वी पर लोकपालों के समान था।

पोकरण – अभिलेख (वि.सं. 1070) में पुण्य पुष्प की तुलना कामदेव से की गई है।

हर्षनाथ लेख (वि.सं. 1030) में चतुर्थ विग्रहराज को इन्द्र के समान पराक्रमी कहा गया है। हस्तिमाता मंदिर शिलालेख (वि.सं. 1057) में शुचि वर्मा के लिए कहा गया है कि शत्रुओं के नगर जलाने में भगवान् शंकर के तुल्य वह राजा मनोहर आकृति वाला साक्षात कामदेव था।

जालौर के परमार राजा धारावर्ष की तुलना इन्द्र से की गई है। वसन्तगढ़ लाण बावड़ा प्रशस्ति (वि.सं. 1099) में विग्रराज के लिए कहा गया है कि वह अपने सामर्थ्य से पृथ्वी को धारण करने वाला, बलशाली, श्रेष्ठ मनुष्यों में उत्तम और विष्णु के समान थे। जालौर लेख (वि.सं. 1174) के अनुसार परमार राजा विज्जराज भगवान शंकर के पुत्र स्कंद के समान और अपने निस्चय के कारण भगवान कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के तुल्य था।

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राजस्थान के राजा के देवत्व की चरम सीमा के देवतुल्य परम्परा के रुप में दृष्टिगोचर होती है। प्राचीन काल में क्षत्रिय राज-परिवारों में राजा की मृत्युपरान्त उसकी प्रतिमा को देवकुल में स्थापित कर उसकी पूजा करने की परम्परा थी।

भास के “प्रतिमा नाटक” में देवकुल परम्परा का भारतीय परिवेश में विवरण प्रस्तुत किया गया है। भास के अनुसार जब भरत अपने ननिहाल से लौट रहा था तो मार्ग में स्थित देवकुल में उसने दिलीप, अज आदि राजाओं की प्रतिमाओं के साथ दशरथ की भी मूर्ति देखी थी। इससे उसे अपने पिता के निधन की जानकारी मिली। इस उदाहरण से स्पष्ट है कि प्राचीन काल में भारत में राज परिवारों में देवकुल निर्माण की परम्परा थी, जो भास के पहले से चली आ रही थी।

चाहमान शासक सोमेश्वर ने नवनिर्मित वैद्यनाथ मंदिर के सम्मुख अपने पिता एवं स्वयं अपनी घोड़े पर सवार प्रतिमाएं स्थापित करवायी थी। अजमेर के चौहानों के लिए यह मन्दिर देवकुल के समान था। देवकुल की इन प्रतिमाओं को परिवारों के महत्वपूर्ण अवसरों पर पूजा जाता था। क्षत्रियों में विवाहों परान्त वर-वधु को देवकुल ले जाया जाता था। वहां परिवार के देवस्वरुप पूर्वजों की पूजा अर्चना कर उनके प्रति श्रद्धा प्रकट की जाती थी।

एक चौहान लेख में लूविंग देव द्वारा स्वयं अपनी तथा रानी की मूर्तियां बनवाकर मंदिर में रखवाये जाने का उल्लेख मिलता है।

उपर्युक्त साक्ष्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि राजस्थान में राजा के देवत्व के परम्परा का विकास प्राचीन काल में ही हो चुका था। इस प्रकार राजा के देवत्व की परम्परा शासक को अपने कर्तव्य के प्रति जागरुक रखने में महत्वपूर्ण घटक सिद्ध हुई।

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