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नासा 50 साल बाद एक बार फिर इंसानों । को चांद पर भेजने के लिए आर्टेमिस मिशन लॉन्च करने जा रहा है। हम चांद के बारे में बता रहे हैं।

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चंद्रमा 27 दिन 8 घंटे में पृथ्वी का एक चक्कर लगाता है। इतने ही समय में वह अपनी धुरी पर भी एक बार घूम जाता है। इसलिए चांद का पिछला हिस्सा कभी भी पृथ्वी के सामने नहीं आ पाता है।

चंद्रमा 27 दिन 8 घंटे में पृथ्वी का एक चक्कर लगाता है। इतने ही समय में वह अपनी धुरी पर भी एक बार घूम जाता है। इसलिए चांद का पिछला हिस्सा कभी भी पृथ्वी के सामने नहीं आ पाता है।

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सौरमंडल में आठ ग्रहों के 181 उपग्रह है। इनमें से चंद्रमा पांचवा बड़ा ग्रह है। बृहस्पति का उपग्रह गैनीमीड सबसे बड़ा है। यह बुध से भी 8% बड़ा है।

सौरमंडल में आठ ग्रहों के 181 उपग्रह है। इनमें से चंद्रमा पांचवा बड़ा ग्रह है। बृहस्पति का उपग्रह गैनीमीड सबसे बड़ा है। यह बुध से भी 8% बड़ा है।

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वैज्ञानिकों का मानना है कि करीब 4.5 अरब साल पहले मंगल ग्रह से भी बड़ा थैया नाम का पिंड पृथ्वी से टकराया था, जिससे एक हिस्सा टूटकर पृथ्वी से अलग हो गया और चंद्रमा बन गया।

वैज्ञानिकों का मानना है कि करीब 4.5 अरब साल पहले मंगल ग्रह से भी बड़ा थैया नाम का पिंड पृथ्वी से टकराया था, जिससे एक हिस्सा टूटकर पृथ्वी से अलग हो गया और चंद्रमा बन गया।

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पृथ्वी पर जब चंद्र ग्रहण होता है, उस समय चंद्रमा पर सूर्य ग्रहण होता है। दरअसल, पृथ्वी चंद्रमा और सूर्य के बीच में होती है, ऐसे में सूर्य का प्रकाश चंद्रमा पर नहीं पड़ पाता। 

पृथ्वी पर जब चंद्र ग्रहण होता है, उस समय चंद्रमा पर सूर्य ग्रहण होता है। दरअसल, पृथ्वी चंद्रमा और सूर्य के बीच में होती है, ऐसे में सूर्य का प्रकाश चंद्रमा पर नहीं पड़ पाता। 

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चांद पर भेजे गए मिशन की वजह से इस पर करीब 1 लाख 81 हजार किलो मलबा जमा हो गया है। यह इंसान की ले जाई गई चीजें हैं या वहां भेजे गए सेटेलाइट के टुकड़े हैं।

चांद पर भेजे गए मिशन की वजह से इस पर करीब 1 लाख 81 हजार किलो मलबा जमा हो गया है। यह इंसान की ले जाई गई चीजें हैं या वहां भेजे गए सेटेलाइट के टुकड़े हैं।

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1958 में अमेरिका ने अपनी ताकत दिखाने के लिए चंद्रमा पर परमाणु बम बलास्ट की योजना बनाई थी। इस मिशन का नाम A119 था।अमेरिका का मानना था कि इस विस्फोट की रौशनी धरती से टेलीस्कोप के बगैर नजर आएगी।

1958 में अमेरिका ने अपनी ताकत दिखाने के लिए चंद्रमा पर परमाणु बम बलास्ट की योजना बनाई थी। इस मिशन का नाम A119 था।अमेरिका का मानना था कि इस विस्फोट की रौशनी धरती से टेलीस्कोप के बगैर नजर आएगी।

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आर्मस्ट्रॉन्ग के जूते के निशान अब भी चंद्रमा पर बने हैं। यह लाखों साल तक ऐसे ही रह सकते हैं, क्योंकि वहां न हवा है, न बारिश होती है।

आर्मस्ट्रॉन्ग के जूते के निशान अब भी चंद्रमा पर बने हैं। यह लाखों साल तक ऐसे ही रह सकते हैं, क्योंकि वहां न हवा है, न बारिश होती है।