राजस्थान में प्रजामण्डल आंदोलन {Republican movement in Rajasthan} राजस्थान GK अध्ययन नोट्स

  • प्रजामण्डल भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय रियासतों की जनता के संगठन थे। 1920 के दशक में प्रजामण्डलों की स्थापना तेजी से हुई।
  • भारतीय रियासतों का शासन व्यवस्था ब्रिटिश नियंत्रण वाले भारतीय क्षेत्र से भिन्न थी तथा अनेक रियासतों के राजा प्रायः अंग्रेजों के मुहरे के समान व्यवहार करते थे। शुरुआती दौर में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस देशी रियासतों में आन्दोलन के प्रति उदासीन रही तथा रियासतों को अपने अभियान से अलग रखा था। हरिपुरा अधिवेशन (1938) में कांग्रेस की नीति में परिवर्तन आया। रियासती जनता को भी अपने-अपने राज्य में संगठन निर्माण करने तथा अपने अधिकारों के लिए आन्दोलन करने की छूट दे दी।
  • राजस्थान में प्रजा मंडल आन्दोलन राजनीतिक जागरण एवं देश में गाँधी जी के नेतृत्व में चल रहे स्वतंत्र संघर्ष का परिणाम था। इसकी पृष्ठभूमि राजस्थान राज्यों में चल रहे कृषक आन्दोलन थे। कृषकों ने विभिन्न आन्दोलनों के माध्यम से उस समय के ठिकानेदारों और जागीरदारों के अत्याचारों को तथा कृषि संबंध में आये विचार को स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रचलित व्यवस्था में असन्तोष व्यापक था। इसलिए 1920 ई. के पश्चात् राजनीतिक अधिकारों और सामाजिक सुधारों से संबंधित संस्थाओं की स्थापना हुई।
  • जयपुर प्रजामण्डल (1931): 1931 ई॰ मे कपूरचन्द पाटनी ने जयपुर प्रजामण्डल का गठन किया था। यह राजस्थान का प्रथम प्रजामण्डल था।सन् 1936 में जयपुर राज्य प्रजा मण्डल का पुनगर्ठन हुआ। इस कार्य के लिए वनस्थली से हीरालाल शास्री को आमन्त्रित किया गया और उन्हें प्रजा मण्डल का प्रधानमंत्री बनाया गया। प्रजामण्डल के सभापति सुप्रसिद्ध एडवोकेट श्री चिरंजीलाल मिश्र बनाए गये। 1938 में प्रजा मण्डल का पहला अधिवेशन जयपुर में हुआ। इसके अध्यथ सेठ जमनालाल बजाज थे। 1940 ई॰मे हीरालाल शास्त्री जयपुर प्रजामण्डल के अध्य्क्ष बने थे।1942 ई॰मे भारत छोङो आँदोलन के समय जयपुर के प्रधानमँत्री मिर्जा इस्माइल ने हीरालाल शास्त्री के साथ “जैन्टलमैन एग्रीमेन्ट”किया था। जिसके अनुसार जयपुर प्रजामण्डल के सदस्यो ने भारत छोङो आँदोलन मे भाग नहीँ लिया परँतु जो सदस्य भाग लेना चाहते थे उन्होने बाबा हरिश्चन्द्र के नेत्रत्व मे “आजाद मोर्चे”का गठन करके भाग लिया था। 15 मई, 1946 को प्रजामण्डल के प्रतिनिधि के रुप में देवी शंकर तिवारी को मंत्रिमंडल में सम्मिलित किया गया। 27 मार्च, 1947 को नया मंत्रिमंडल बना, जिसमें 7 सदस्यों में से 4 सदस्य प्रजामण्डल के व 2 जागीरदार वर्ग के थे। नवम्बर, 1948 में जयपुर महाराजा राजस्थान में मिलने को सहमत हो गये, जिसकी राजधानी जयपुर व महाराजा राज प्रमुख बने। श्री हीरालाल शास्री पुनर्गठित राजस्थान के मुख्यमंत्री पद पर आसीन हुए। अप्रैल, 1949 को जयपुर राजस्थान का एक अंग बन गया।
  • मेवाड़ प्रजामंडल (1938): वर्ष 1936 ई. में मेवाड़ में संगठित राजनीतिक आन्दोलन की शुरुआत हो गयी। इस नई जन-जागृति के जनक थे, बिजोलिया आन्दोलन में पथिक जी के सहायक श्री माणिक्यलाल वर्मा। 25 अप्रैल, 1938 को माणिक्यलाल वर्मा ने उदयपुर में कार्यकर्त्ताओं की बैठक कर प्रजामंडल का विधान स्वीकृत कराया। बलवन्त सिंह मेहता, भूरेलाल और माणिक्यलाल वर्मा क्रमशः अध्यक्ष, उपाध्यक्ष तथा महामंत्री पद पर मनोनीत हुए। प्रजामंडल की स्थापना के साथ ही इसे गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया और आन्दोलन प्रचारकों के विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाहियाँ की जाने लगी। माणिक्यलाल वर्मा को भी राज्य से निष्कासित कर दिया गया। 22 फरवरी, 1941 को प्रजामण्डल पर प्रतिबन्ध हटा दिया गया। प्रजामण्डल की शाखाएँ राज्य भर में स्थापित की गई तथा वर्माजी की अध्यक्षता में प्रजामण्डल का प्रथम अघिवेशन उदयपुर में हुआ जिसमें आचार्य कृपलानी व श्रीमती विजयलक्ष्मी पंडित भी आए। 18 अप्रैल, 1948 को पं. नेहरु ने उदयपुर में नवनिर्मित संयुक्त राजस्थान का उद्घाटन किया। महाराणा राजप्रमुख बने तथा माणिक्यलाल वर्मा प्रधानमंत्री बन गये।
  • कोटा में प्रजामण्डल: कोटा राज्य में जन-जागृति के जनक पं. नयनूराम शर्मा थे। उन्हानें थानेदार के पद से इस्तीफा देकर सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया था। वे विजयसिंह पथिक द्वारा स्थापित राजस्थान सेवा संघ के सक्रिय सदस्य बन गए। उन्होंने कोटा राज्य में बेगार विरोधी आन्दोलन चलाया, जिसके फलस्वरूप बेगार प्रथा की प्रताड़ना में कमी आई। 1939 में पं. नयनूराम शर्मा और पं. अभिन्न हरि ने कोटा राज्य में उत्तरदायी शासन स्थापित करने के उद्देश्य को लेकर कोटा राज्य प्रजामण्डल की स्थापना की। प्रजामण्डल का पहला अधिवेशन पं. नयनूराम शर्मा की अध्यक्षता में मांगरोल (बाराँ) में सम्पन्न हुआ।
  • अजमेर में प्रजामण्डल: अजमेर में जमनालाल बजाज की अध्यक्षता में ”राजपूताना मध्य भारत सभा’ का आयोजन (1920) किया गया, जिसमें अर्जुन लाल सेठी, केसरीसिंह बारहठ, राव गोपालसिंह खरवा, विजयसिंह पथिक आदि ने भाग लिया। इसी वर्ष देश में खिलाफत आन्दोलन चला। अक्टूबर, 1920 में ‘राजस्थान सेवा संघ’ को वर्धा से लाकर अजमेर में स्थापित किया गया, उसका उद्देश्य राजस्थान की रियासतों में चलने वाले आन्दोलनों को गति देना था। उसी समय रामनारायण चौधरी वर्धा से लौटकर अपना कार्य क्षेत्र अजमेर बना चुके थे। अजमेर में 15 मार्च, 1921 को द्वितीय राजनीतिक कांफ्रेस का आयोजन हुआ, जिसमें मोतीलाल नेहरू उपस्थित थे। मौलाना शौकत अली ने सभा की अध्यक्षता की थी। सभा में विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार का आह्वान किया गया। पंडित गौरीशंकर भार्गव ने अजमेर में विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार की अगुवाई कर प्रथम गांधीवादी बनने का सौभाग्य प्राप्त किया। जब ‘प्रिंस आफ वेल्स’ का अजमेर आगमन (28 नवम्बर, 1921) हुआ, तो उसका स्वागत के स्थान पर बहिष्कार किया गया, हड़ताल की गई तथा दुकाने बन्द की गई। प्रिंस की यात्रा की व्यापक प्रतिक्रिया हुई।
  • मारवाड़ (जोधपुर) प्रजामण्डल: जोधपुर के प्रजामण्डल के इतिहास में बालमुकुन्द बिस्सा का नाम स्मरणीय रहेगा। मारवाड़ के एक छोटे से ग्राम पीलवा, तहसील डीडवाना में जन्मे बालमुकुन्द बिस्सा ने 1934 में जोधपुर में गांधी जी से प्रेरित होकर खादी भण्डार खोला और तब से राष्ट्रीय कार्यक्रमों में भाग लेने लगा। उसका जवाहर खादी भण्डार शीघ्र ही राजनीतिक गतिविधियों का केन्द्र बन गया। 1942 में जोधपुर में उत्तरदायी शासन के लिए जो आन्दोलन चला, उसमें उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। जहाँ भूख हड़ताल एवं यातनाओं के कारण वह शहीद हो गया परन्तु उससे प्रेरित होकर कई युवा प्रजामण्डल आन्दोलन में कूद पड़े।
  • अलवर प्रजामण्डल (1938): 1938 में अलवर प्रजामण्डल की स्थापना हुई। भोलानाथ मास्टर ने राज्य सेवा त्याग कर प्रजामण्डल का कार्य किया। द्वितीय महायुद्ध में राज्य में युद्ध के लिए चंदे एकत्रित करने का विरोध किया गया व फरवरी, 1946 में खेड़ा मंगलसिंह ने जमींदारों के जुल्म के विरुद्ध प्रजामण्डल का सम्मेलन किया। आंदोलन चला व कार्यकर्त्ता बंदी बनाए गए। हीरालाल शास्री की मध्यस्थता से समझौता हुआ व बंदी रिहा किए गए।
  • भरतपुर प्रजामण्डल (1938): 1938 में भरतपुर में किशनलाल जोशी, गोपीलाल यादव, मास्टर आदित्येंद्र व युगलकिशोर चतुर्वेदी ने प्रजा मण्डल की स्थापना की। फतेहपुर सीकरी में पूर्वी राजस्थान का राजनीतिक सम्मेलन हुआ व राज्य सरकार को प्रजा मण्डल को मान्यता देने का अल्टीमेटम दिया। अप्रैल, 1939 में सत्याग्रह किया गया, जिसमें कार्यकर्त्ता बंदी बनाए गए। 35 अक्टूबर, 1939 को समझौता हुआ व प्रजा मण्डल का नाम बदल कर प्रजा-परिषद् रखा गया। दिसम्बर, 1940 में जय नारायण व्यास की अध्यक्षता में भरतपुर में राजनीतिक सम्मेलन हुआ। अगस्त, 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के साथ ही राज्य में आंदोलन हुआ,जिसमें पुनः कार्यकर्त्ता गिरफ्तार हुए, किंतु बाढ़ के राहत कार्यों में प्रजापरिषद् ने सक्रिय सहयोग दिया।
  • करौली प्रजामण्डल (1939): मुँशी त्रिलोक चंद्र माथुर ने 1938 में करौली में राज्य सेवक संघ तथा स्थानीय काँग्रेस की स्थापना की। 1939 में माथुर ने प्रजा मण्डल की स्थापना की। 1942 में अगस्त-क्रांति में कल्याण प्रसाद गुप्ता को बंदी बनाया गया। 1946 में प्रजा मण्डल सक्रिय हुआ। करौली के शासक गणेशपाल ने 18 मार्च, 1948 में मत्स्य संघ में करौली को सम्मिलित कर दिया तथा 15 मई, 1949 को राजस्थान में विलय करा दिया।
  • बीकानेर प्रजामंडल(1936): मघाराम वैद्य (कलकत्ता में, राज्य के बाहर स्थापित होने वाला प्रजामंडल), एडवोकेट रघुवरदयाल, बाबू मुक्ताप्रसाद
  • भरतपुर प्रजामंडल (1938): किशनलाल जोशी, मास्टर आदित्येन्द्र, डॉ. देवराज, युगलकिशोर चतुर्वेदी और गोपीलाल यादव। अध्यक्ष- गोपीलाल यादव एवं मंत्री किशन लाल जोशी।
  • बाँसवाड़ा प्रजामंडल (1943): भूपेंद्र नाथ त्रिवेदी, धूलजी भाई भावसार और हरिदेव जोशी
  • डूंगरपुर प्रजामंडल (1944): अध्यक्ष भोगीलाल पंड्या (बागड़ के गाँधी), महामंत्री शिवलाल कोटडिया
  • किशनगढ़ प्रजामंडल(1939): कांतिलाल चौथानी संस्थापक। जमालशाह अध्यक्ष एवं महमूद महामंत्री बने।
  • बूंदी प्रजामंडल(1931): कान्तिलाल और नित्यानंद
  • सिरोही प्रजामंडल(1939): मुम्बई में कुछ उत्साही युवकों द्वारा 1934 में सिरोही प्रजामंडल गठन किया, किन्तु इसका विधिवत गठन 23 जनवरी, 1939 को गोकुल भाई भट्ट (राजस्थान के गाँधी ) ने किया।
  • प्रतापगढ़ प्रजामंडल (1946): अमृत लाल पायक और चुन्नीलाल
  • झालावाड़ प्रजामंडल (1947): मांगीलाल भव्य और कन्हैयालाल मित्तल। महाराजा स्वयं भी इसमें शामिल हुए थे।
  • जैसलमेर प्रजा परिषद् (1945): माणिक्यलाल वर्मा, गोकुल लाल असावा

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