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ध्वनि प्रदूषण आकलन एवं नियंत्रण

ध्वनि प्रदूषण और पर्यावरणीय शोर मानव और अन्य जीवों को कष्ट पहुंचा रहा है। अवांछित ध्वनि से मानव को शारीरिक एवं मानसिक समस्याएं होती हैं। यह उच्च रक्तचाप, उच्च मानसिक दबाव आदि कई बीमारियां पैदा करता है जिससे लोग भूलने, गंभीर अवसाद, नींद न आने और अन्य गंभीर प्रभावों की चपेट में आ जाते हैं।

शोर पशुओं के लिए भी बहुत घातक है क्योंकि इससे उनमें भी मानसिक दबाव बढ ज़ाता है और मृत्युदर बढ ज़ाती है। शोर की वजह से कई बार हिंसक जीव जहां अपना शिकार नहीं ढू़ंढ पाते हैं वहीं दूसरे जीव शिकार होने से बच नहीं पाते। पशु जीवन पर शोर का असर यह भी होता है कि उनका पर्यावास घट जाता है और संकटापन्न जीव विलुप्त होने के कगार पर पहुंच जाते हैं। ध्वनि प्रदूषण के घातक प्रभावों में से सबसे उल्लेखनीय एक प्रभाव यह है कि व्हेल की कुछ प्रजातियां शोर की वजह से मर जाती हैं।

दुनियाभर में घर से बाहर ध्वनि प्रदूषण के कारणों में निर्माण एवं परिवहण प्रणाली खासकर मोटर वाहन, विमान एवं रेल यातायात प्रमुख है। घटिया शहरी नियोजन के चलते भी ध्वनि प्रदूषण होता है क्योंकि कई शहरों में औद्योगिक और आवासीय भवन आसपास होते हैं।

घर के अंदर और बाहर के ध्वनि प्रदूषणों में कार अलार्म, आपातकालीन सेवा साइरन, मशीनी उपकरण, पटाखे, कंप्रेस्ड एयर होर्न,उपकरण, बिजली के उपकरण, मेगाफोन आदि शामिल हैं।

शोर की वजह से अनेक जीव भी ऊंचा बोलते हैं जिसे लोम्बार्ड वोकल रिस्पोंस कहा जाता है। वैज्ञानिकों और अनुसंधानकर्ताओं के प्रयोग से पता चलता है कि जब पानी में कोई खोजपरक उपकरण होता है तब व्हेल मछलियां ऊंचा बोलती हैं।

शोर को ध्वनि (प्रदूषण की रोकथाम एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 के तहत ध्वनि प्रदूषकों की परिभाषा में शामिल किया गया है। पर्यावरण (सुरक्षा) अधिनियम, 1986 तथा वायु अधिनियम, 1981 के तहत पारिवेशिक मानक ध्वनि अधिसूचना में भी इसे शामिल किया गया है। इससे केंद्रीय, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और प्रदूषण नियंत्रण समितियों को ध्वनि प्रदूषण फैलाने वाले रुाोतों के खिलाफ उपयुक्त कदम उठाने में मदद मिलती है। विशिष्ट ध्वनि मानक के लिए निम्नलिखित रुाोत बताए गए हैं-

Ø मोटर वाहनों के लिए ध्वनि मानक: ये मानक विनिर्माण चरण में लागू होते हैं और इन्हें भूतल परिवहन मंत्रालय लागू करवाता है।

Ø डीजल जेनरेटर सेट के लिए ध्वनि मानक: संशोधित अधिसूचना में जेनरेटर सेटों (1000केवीए तक के) के लिए विनिर्माण चरण में ध्वनि मानक तय किए गए हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड विभिन्न प्रमाणन एजेंसियों की मदद से इन्हें लागू करवाता है। संशोधित अधिसूचना में पहली जनवरी, 2005 के पहले निर्मित और या 1000केवीए से अधिक की क्षमता वाले जेनरेटर सेटों के लिए ध्वनि मानक तय किए गए हैं।

Ø आतिशबाजी के लिए ध्वनि मानक: ये विनिर्माण चरण में ही लागू होते हैं। विस्फोटक विभाग (जो अब पेट्रोलियम एवं विस्फोटक सुरक्षा संगठन के नाम से जाना जाता है) इन मानकों के लिए कार्यान्वयन एजेंसी है।

इन मानकों के अलावा, पारिवेशिक ध्वनि मानक तय करने एवं लाऊडस्पीकरों के कारण होने वाले शोर को विनियमित करने के लिए ध्वनि प्रदूषण (विनियमन एवं नियंत्रण) नियमावली, 2000 अधिसूचित की गयी है। इसके तहत ध्वनि को विनियमित करने के लिए जिला अधिकारी, पुलिस आयुक्त या पुलिस उपाधीक्षक स्तर का कोई भी अधिकारी कार्रवाई करने के लिए अधिकृत है। वायु अधिनियम, 1981 तथा पर्यावरण (सुरक्षा) अधिनियम, 1986 के प्रावधानों के अलावा फैक्ट्री अधिनियम 1948 के तहत भी कार्यस्थलों पर अधिकतम मान्य शोर का प्रावधान है।

ध्वनि प्रदूषण पर एक राष्ट्रीय समिति गठित की गयी है जो केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को ध्वनि प्रदूषण से संबंधित मामलों पर उपयुक्त सलाह देती है। सीपीसीबी और दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति दिल्ली में पारिवेशिक ध्वनि स्तर पर निगरानी रखती है। चेन्नई, कोलकाता, मुम्बई, तथा अन्य शहरों में भी संबंधित राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और पीसीसी द्वारा उत्सवों के अवसरों पर ध्वनि के स्तर की निगरानी की जाती है।

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