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राजस्थान में खनिज संसाधन {Mineral Resources in Rajasthan} राजस्थान GK अध्ययन नोट्स

  • मुख्यमंत्री श्रीमती वसुन्धरा राजे ने जून 2015 को नई दिल्ली में आयोजित एम्बेसडर्स राउंड टेबल कांफ्रेंस में नई राजस्थान खनिज नीति 2015 (Rajasthan Mining Policy 2015) जारी की है। नवीन खनिज नीति से राज्य में निहित संसाधन आधारित अवसरों का लाभ उठाने में निवेशकों को सुविधा होगी। राजस्थान के ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों के लोगों को अधिक से अधिक रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना नई नीति का मुख्य उद्देश्य है।
  • राजस्थान को खनिजों का अजायबघर भी कहा जाता हैं। खनिज भंडार की दृष्टि से राज्य का देश में दूसरा स्थान हैं।
  • खनन आय की दृष्टि से राज्य का देश में पांचवा स्थान हैं। देश में सर्वाधिक खानें राजस्थान में हैं।
  • देश के कुल एस्बेस्टोस,रॉक सल्फेट एंवम मुल्तानी मिट्टी का 90% उत्पादन राजस्थान में होता हैं।
  • रॉक फास्फेट की प्रमुख खान झामर कोटड़ा हैं। राजस्थान देश का एकमात्र तामड़ा,बूलस्टोनाइट,पन्ना एंवम जेस्पार उत्पादक राज्य हैं।
  • लिग्नाइट: राजस्थान 4986 मिलियन टन लिग्नाइट भंडार से लैस है, जबकि देश में इसका भंडार 37,460 मिलियन टन है। इस भंडार में देश की भागीदारी 13 फीसदी है और यह इस मामले में दूसरे स्थान पर है। यूसीजी, सीबीएम और लिग्नाइट के क्षेत्र में खोज एवं विद्युत उत्पादन के स्तर पर काफी संभावनाएं हैं।
  • चूना-पत्थर (सीमेंट ग्रेड): राज्य में उत्पादित चूना-पत्थर का इस्तेमाल सीमेंट उत्पादन, रसायनिक उद्योग और लाइम बर्निंग के लिए होता है। एसएमएस ग्रेड चूना-पत्थर राज्य में उत्पादित किया जाता है, जिनका इस्तेमाल इस्पात संयंत्रों में होता है। राज्य के लगभग सभी क्षेत्रों में यह पाया जाता है।
  • चूना-पत्थर (एसएमएस ग्रेड): जैसलमेर, नागौर, जोधपुर और पाली जिलों में 900 मिलियन टन एसएमएस ग्रेड चूना-पत्थर एवं हाई ग्रेड चूना-पत्थर का भंडार है। एसएमएस ग्रेड के चूना-पत्थर का इस्तेमाल इस्पात संयंत्र में लक्स के तौर पर किया जाता है।
  • लीड-जिंक, कॉपर: राज्य शीशा एवं जिंक (100 फीसदी) और तांबा (47.76 फीसदी) के राष्ट्रीय उत्पादन में भारी योगदान देता है। तांबा को महत्वपूर्ण भंडार नॉर्थ देल्ही फोल्ड बेल्ट के खेत्री में मौजूद है, जो 80 किलोमीटर लंबा बेल्ट है। साउथ डेल्ही फोल्ड बेल्ड, जिसमें अगुचुआ (भीलवाड़ा), राजपुरा-दरिबा (राजसमंद) और जवार (उदयपुर) शामिल है, को शीशा एवं जस्ता के विशाल भंडार के लिए जाना जाता है। इनके अलावा, सिरोही जिले का डेरी-बसंतगढ़, अजमेर जिले का श्रीनगर, अलवर जिले का खो-दरिबा और भरतपुर जिले का खान-खेरा जिला भी धातु भंडार के अन्य प्रमुख ठिकानों मंे शुमार हैं।
  • चांदी एवं सोना: सोना का भंडार बांसवारा एवं दौसा जिलों में है। देश के कुल चांदी भंडार में राज्य की भागीदारी 80.84 फीसदी है और यह मूल धातुओं के स्मेल्ंिटंग प्रसंस्करण के दौरान यह प्राप्त होता है।
  • लोहा एवं मैंगनीज: लोहा एवं मैंगनीज का पता लगाने एवं उनके खनन का काम एक ऐसी एजेंसी को दिया जाएगा जो यह वादा करे कि वह राजस्थान में एक इस्पात संयंत्र स्थापित करेगी।
  • क्वार्ट्ज एवं फेल्डस्पार (सिरैमिक मिनरल्स): र्क्वाट्ज एवं फेल्डस्पार के भंडार मुख्यतः 200 किलोमीटर से अधिक लंबी पट्टी में पाये जाते हैं, जो दक्षिण-पश्चिम में राजसमंद से पूर्वोत्तर राजस्थान के टांेक तक फैला हुआ है, जिसके दायरे में भीलवाड़ा एवं अजमेर भी पाये जाते हैं। इनके भंडार जयपुर, सिकर, झुनझुनू, उदयपुर, पाली एवं सिरोही में भी बड़े पैमाने पर मौजूद हैं। राजस्थान क्वार्ट्ज एवं फेल्डस्पार का मुख्य उत्पादक है, जहां क्ले एवं वोलैस्टोनाइट जैसी दूसरी व्यावसायिक सामग्रियां भी पाई जाती हैं। सिरैमिक इकाइयों की स्थापना की यहां भारी संभावना है, खासकर वेट्रीफाइड सिरैमिक टाइल्स की, जिसकी मांग तेजी से बढ़ रही है।
  • जिप्सम: जिप्सम के भंडार राज्य के पश्चिमी हिस्से में पाये जाते हैं, जो देश के कुल जिप्सम भंडार का 81.39 फीसदी है। राज्य जिप्सम का प्रमुख उत्पादक है, जिसका कुल उत्पादन में 98.81 फीसदी का योगदान है। सीमेंट एवं उर्वरक दो ऐसे प्रमुख उद्योग हैं, जिनमें जिप्सम का इस्तेमाल होता है। इसके अलावा, इसका इस्तेमाल प्लास्टर ऑफ पेरिस, पार्टिशन ब्लॉक्स, शीट्स एवं टाइल्स, इंसुलेशन बोर्ड, फार्मास्युटिकल्स, टेक्सटाइल्स, पेंट एवं पेपर आदि के निर्माण में होता है।
  • रॉक फास्फेट: देश के कुल रॉक फास्फेट उत्पादन में राज्य का योगदान करीब 94.08 फीसदी है। इसके प्रमुख भंडार झामर-कोटरा, कानपुर, बरगौन, डाकन-कोटरा, उदयपुर जिले और बीरमानिया, जैसलमेर जिले में हैं।
  • पोटाश: भारतीय भू-सर्वेक्षण (जीएसआई) ने राजस्थान बेसिन के नागौर-गंगानगर बेसिन में पोटाश खनिज का विशाल भंडार खोजा है, जो 30,000 वर्ग किलोमीटर में फैला है। चूंकि देश में पोटाश का कोई व्यावसायिक उत्पादन नहीं होता, भारत अपनी इस जरूरत की पूर्ति आयात से करता है। ऐसे में राज्य में इस भंडार के दोहन की भरपूर संभावना है।
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