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मध्यकालीन राजपूत राज्य {Medieval Rajput States} राजस्थान GK अध्ययन नोट्स

  • हर्षवर्धन(606-647ई.) की मृत्यु के उपरान्त केंद्रीय शक्ति के अभाव में राजपूतों एवं अन्य राजवंशों का उदय हुआ था, उनमें राजस्थान में अधिकांश राजपूत वर्ग के अन्तर्गत ही आते थे।
  • राजपूतों की उत्पत्ति के विषय में उतने ही मत हैं जितने कि उसके विद्वान। जहाँ एक ओर कुछ विद्वान राजपूतों को विदेशी बताते हैं, वहीं दूसरे उन्हें देशी मानते हैं जबकि एक तीसरा मत उनकी देशी – विदेशी मिश्रित उत्पत्ति मानता है। जयनारायण आसोपा के अनुसार वैदिक कालीन ‘राजपुत्र’ ‘राजन्य’, या ‘क्षत्रिय’ वर्ग ही कालान्तर में राजपूत जाति में परिणत हो गया। ‘राजपूत’ शब्द वैदिक ‘राजपुत्र’ का ही अपभ्रंश शब्द है।
  • चौहान वंश की अनेक शाखाओं में ‘शाकंभरी चौहान’ (सांभर-अजमेर के आस-पास का क्षेत्र) की स्थापना लगभग 7वीं शताब्दी में वासुदेव ने की। वासुदेव के बाद पूर्णतल्ल, जयराज, विग्रहराज प्रथम, चन्द्रराज, , पृथ्वीराज तृतीय (1168-1192 ई.) जैसे अनेक शासकों ने शासन किया।
  • चौहानों के मूल स्थान के संबंध में मान्यता है कि वे सपादलक्ष एवं जांगल प्रदेश के आस-पास रहते थे। उनकी राजधानी ‘अहिच्छत्रपुर’ (नागौर) थी। बिजौलिया प्रशस्ति में वासुदेव को सांभर झील का निर्माता माना गया है।
  • अजयराज चौहान ने 1113 ई. में अजमेर नगर की स्थापना की। उसके पुत्र अर्णोराज (आनाजी) ने अजमेर में आनासागर झील का निर्माण करवाकर जनोपयोगी कार्यों में भूमिका अदा की। चौहान शासक विग्रहराज चतुर्थ का काल सपादलक्ष का स्वर्ण युग कहलाता है। विग्रहराज ने अजमेर में एक संस्कृत पाठशाला का निर्माण करवाया, जिस पर आगे चलकर क़ुतुबुद्दीन ऐबक ने ‘ढाई दिन का झोपड़ा’ नामक मस्जिद का निर्माण करवाया।
  • चौहान वंश में पृथ्वीराज चौहान तृतीय उत्तरी भारत का प्रतिभाशाली राजा था। पृथ्वीराज तृतीय की 1192 में तराइन के प्रथम युद्ध में मुहम्मद ग़ोरी से हार के साथ ही चौहान वंश का पतन शुरू हो गया ।
  • रणथम्भौर के चौहान वंश की स्थापना पृथ्वीराज चौहान के पुत्र गोविन्द राज ने की थी। यहाँ के प्रतिभा सम्पन्न शासकों में हम्मीर का नाम सर्वोपरि है। दिल्ली के सुल्तान जलालुद्दीन ख़िलजी ने हम्मीर के समय रणथम्भौर पर असफल आक्रमण किया था। अलाउद्दीन ख़िलजी ने 1301 में रणथम्भौर पर आक्रमण कर दिया, हम्मीर इसमें वीरगति को प्राप्त हुआ। हम्मीर की रानी रंगादेवी और पुत्री ने जौहर व्रत द्वारा अपने धर्म की रक्षा की। यह राजस्थान का प्रथम जौहर माना जाता है।
  • जालौर की चौहान शाखा का संस्थापक कीर्तिपाल था। इस शाखा का प्रसिद्ध शासक कान्हड़दे चौहान था।
  • हाड़ौती क्षेत्र पर चौहान वंशीय हाड़ा राजपूतों का अधिकार था। प्राचीन काल में इस क्षेत्र पर मीणाओं का अधिकार था। ऐसा माना जाता है कि बून्दा मीणा के नाम पर ही बूँदी का नामकरण हुआ।

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