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राजस्थान की हवेलियां {Havelis of Rajasthan} राजस्थान GK अध्ययन नोट्स

1. जैसलमेर की हवेलियाँ

  • पटुओं के हवेली: 18 वीं शताब्दी के उतरार्द्ध में जैसलमेर के एक व्यवसायी गुमानाचंद पटुआ के 5 पुत्रो ने इस हवेली का निर्माण करवाया था । छियासठ झरोखों से युक्त ये हवेलियाँ निसंदेह कला का सर्वेतम उदाहरण है। ये कुल मिलाकर पाँच हैं, जो कि एक-दूसरे से सटी हुई हैं। ये हवेलियाँ भूमि से 8-10 फीट ऊँचे चबूतरे पर बनी हुई है व जमीन से ऊपर छः मंजिल है व भूमि के अंदर एक मंजिल होने से कुल 7 मंजिली हैं। पाँचों हवेलियों के अग्रभाग बारीक नक्काशी व विविध प्रकार की कलाकृतियाँ युक्त खिङ्कियों, छज्जों व रेलिंग से अलंकृत है। जिसके कारण ये हवेलियाँ अत्यंत भव्य व कलात्मक दृष्टि से अत्यंत सुंदर व सुरम्य लगती है।
  • नथमलजी की हवेली : जैसलमेर राज्य के दीवन मेहता नाथमल ने इसका निर्माण 1884-85 में करवाया था
  • यह हवेली पाँच मंजिली पीले पत्थर से निर्मित है। हवेली में सुक्ष्म खुदाई मेहराबों से युक्त खिङ्कियों, घुमावदार खिङ्कियाँ तथा हवेली के अग्रभाग में की गई पत्थर की नक्काशी पत्थर के काम की दृष्टि से अनुपम है। इस अनुपम काया कृति के निर्माणकर्त्ता हाथी व लालू उपनाम के दो मुस्लिम कारीगर थे।
  • सालिमसिंह की हवेली – जैसलमेर राज्य के प्रधानमंत्री सालिमसिंह मेहता ने 18 वीं शताब्दी में इस हवेली का निर्माण करवाया था . इस हवेली को “मोती” महल भी कहते है. जहाजनुमा इस विशाल भवन आकर्षक खिङ्कियाँ, झरोखे तथा द्वार हैं। नक्काशी यहाँ के शिल्पियों की कलाप्रियता का खुला प्रदर्शन है। इस हवेली का निर्माण दीवान सालिम सिंह द्वारा करवाया गया, जो एक प्रभावशाली व्यक्ति था और उसका राज्य की अर्थव्यवस्था पर पूर्ण नियंत्रण था।

2. बीकानेर की हवेलियाँ

  • बीकानेर की प्रसिद्ध ‘बच्छावतों की हवेली’ का निर्माण सोलहवीं सदी के उत्तरार्द्ध में कर्णसिंह बच्छावत ने करवाया था।
  • इसके अतिरिक्त बीकानेर में रामपुरिया हवेली, कोठारी हवेली, मोहता हवेलीड़ा आदि की हवेलियाँ अपने शिल्प वैभव के कारण विख्यात है।
  • बीकानेर की हवेलियाँ लाल पत्थर से निर्मित है। इन हवेलियों में ज्यॉमितीय शैली की नक्काशी है एवं आधार को तराश कर बेल-बूटे, फूल-पत्तियाँ आदि उकेरे गये हैं।
  • इनकी सजावट में मुगल, किशनगढ़ एवं यूरोपीय चित्रशैली का प्रयोग किया गया है।

3. जोधपुर की हवेलियाँ

  • जोधपुर में बड़े मियां की हवेली, पोकरण की हवेली, राखी हवेली, टोंक की सुनहरी कोठी, उदयपुर में बागौर की हवेली, जयपुर का हवामहल, नाटाणियों की हवेली, रत्नाकार पुण्डरीक की हवेली, पुरोहित प्रतापनारायण जी की हवेली, फल हवेली इत्यादि हवेली स्थापत्य के विभिन्न रूप हैं।
  • राजस्थान में मध्यकाल के वैष्णव मंदिर भी हवेलियों जैसे ही बनाये गये हैं। इनमें नागौर का बंशीवाले का मंदिर, जोधपुर का रणछोड़जी का मंदिर, घनश्याम जी का मंदिर, जयपुर का कनक वृंदावन आदि प्रमुख हैं।
  • देशी-विदेशी पर्यटकों को लुभानें तथा राजस्थानी स्थापत्य कला को संरक्षण देने के लिए वर्तमान में अनेक हवेलियों का जीर्णोद्धार किया जा रहा है।

4. सीकर की हवेलियाँ

  • सीकर में गौरीलाल बियाणी की हवेली, रामगढ़ (सीकर) में ताराचन्द रूइया की हवेली समकालीन भित्तिचित्रों के कारण प्रसिद्ध है।
  • फतहपुर (सीकर) में नन्दलाल देवड़ा, कन्हैयालाल गोयनका की हवेलियाँ भी भित्तिचित्रों के कारण प्रसिद्ध है।
  • चूरू की हवेलियों में मालजी का कमरा, रामनिवास गोयनका की हवेली, मंत्रियों की हवेली इत्यादि प्रसिद्ध है।
  • खींचन (जोधपुर) में लाल पत्थरों की गोलेछा एवं टाटिया परिवारों की हवेलियाँ भी कलात्मक स्वरूप लिए हुए है।
  • अन्य हवेलियाँ पंसारी की हवेली (श्रीमाधोपुर) एवं केडिया एवं राठी की हवेली (लक्ष्मणगढ़) प्रमुख है

5. चित्तौड़गढ़ की हवेलियाँ

  • पत्ता तथा जैमल की हवेलियाँ: गौमुख कुण्ड तथा कालिका माता के मंदिर के मध्य जैमल पत्ता के महल हैं, जो अभी भगनावशेष के रुप में अवस्थित हैं। राठौड़ जैमल (जयमल) और सिसोदिया पत्ता चित्तौड़ की अंतिम शाका में अकबर की सेना के साथ युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गये थे। महल के पूर्व में एक बड़ा तालाब है, जिसे जैमल-पत्ता का तालाब कहा जाता है। जलाशय के तट पर बौद्धों के ६ स्तूप हैं। इन स्तूपों से यह अनुमान लगाया जाता है कि प्राचीन काल में अवश्य ही यहाँ बौद्धों का कोई मंदिर रहा होगा।
  • राव रणमल की हवेली: गोरा बादल की गुम्बजों से कुछ ही आगे सड़क के पश्चिम की ओर एक विशाल हवेली के खण्डहर नजर आते हैं। इसको राव रणमल की हवेली कहते हैं। राव रणमल की बहन हंसाबाई से महाराणा लाखा का विवाह हुआ। महाराणा मोकल हँसा बाई से लाखा के पुत्र थे।
  • भामाशाह की हवेली: अब भग्नावस्था में मौजूद यह इमारत, एक समय मेवाड़ की आनबान के रक्षक महाराणा प्रताप को मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सब कुछ दान करने वाले प्रसिद्ध दानवीर दीवार भामाशाह की याद दिलाने वाली है। कहा जाता है कि हल्दीघाटी के युद्ध के पश्चात् महाराणा प्रताप का राजकोष खाली हो गया था व मुगलों से युद्ध के लिए बहुत बड़ी धनराशि की आवश्यकता थी। ऐसे कठिन समय में प्रधानमंत्री भामाशाह ने अपना पीढियों से संचित धन महाराणा को भेंट कर दिया। कई इतिहासकारों का मत है कि भामाशाह द्वारा दी गई राशि मालवा को लूट कर लाई गई थी, जिसे भामाशाह ने सुरक्षा की दृष्टि से कहीं गाड़ रखी थी।
  • आल्हा काबरा की हवेली: भामाशाह की हवेली के पास ही आल्हा काबरा की हवेली है। काबरा गौत्र के माहेश्वरी पहले महाराणा के दीवान थे।

6. कोटा की हवेलियाँ

  • झालाजी की हवेली – जालिम सिंह द्वारा
  • देवताजी की हवेली – देवता श्रीधरजी की हवेली

7. चुरू की हवेलियाँ

  • गोयनका की हवेली
  • सुराणा की हवेली – इसमें 1100 दरवाजे एवं खिड़कियाँ है

8. झुंझुनूं की हवेलियाँ

  • बिसाऊ= नाथूराम पोद्दार की हवेली , हीराराम बनारसी लाल की हवेली , जयदयाल केडिया की हवेली, सीताराम सिगतिया की हवेली
  • नवलगढ़ – पौद्दार और भगेरिया की हवेलियाँ, भगतो की हवेली
  • चिड़ावा = बागडिया व डालमिया की हवेली
  • महनसर – सोने-चांदी की हवेली
  • मुकन्दगढ़ – केसरदेव , कानोडीयाँ की हवेली
  • डूंडलोद – गोयनका की हवेली
  • मण्डावा – सागरमल लाडिया, रामदेव चौखाणी तथा रामनाथ गोयनका की हवेली
  • झुंझुनू – टीबड़े वाला की हवेली, ईसरदास मोदी की हवेली

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